रामप्रसाद बिस्मिल

क्रांति के देवता पंडित रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल 11 स. 1954 ( 12 जून 1897)शाहजहांपुर ,उत्तर प्रदेश में हुआथा।
पंडित रामप्रसाद कवि नाम “बिस्मिल” को हम क्रांति के देवता से संबोधित करेंगे ।
आजादी की लड़ाई में बिस्मिल व अश्फाक की जोड़ी प्रेरणा रही है।
बिस्मिल बचपन मे शरारती प्रवर्ति के बालक थे । पढ़ाई से कतराते थे। एकबार आपके द्वारा “उ” शब्द नहीं लिखा जा सका तो पिताश्री ने आपको थप्पड़- घूंसे ही नहीं लोहे के गज के पीटा।
भला हो उन पुजारी जी का जिनके सानिध्य से सुधरकर आप सात्विक बन गए।
आप स्वामी दयानंद जी के ब्रह्मचर्य पालन से अत्यधिक प्रभावित हुए व तख्त या जमीन पर सोना, रात्रिभोज नहीं करना शुरू कर दिया ।
पिताजी कट्टर सनातनी थे । आप बन गए आर्यसमाजी । एक दिन तो पिताजी ने रात को ही घर से बाहर कर दिया।
देवयोग से आपको स्वामी सोमदेव जी जैसे गुरु मिले जिनकी लाला हरदयाल जैसे क्रांतिकारी पुरूष से भी निकटता थी ।
सन 1916 में प्रथम लाहौर एक्शन के समय क्रांतिकारी भाईपरमानन्द जी की पुस्तक तवारीख़-ए -हिन्द से प्रभावित हुए।
लाहौर प्रथम एक्शन में भाई परमानंद को फांसी की सजा का समाचार पढ़कर आपने इस फांसी का बदला लेने की प्रतिज्ञा की और यहीं से आपके क्रांतिकारी जीवन का सूत्रपात हुआ।
इसी वर्ष लखनऊ में अखिल भारतीय कांग्रेसका अधिवेशन था। अधिवेशन में आधुनिक स्वतंत्रता संग्राम के जनक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के पधारने का कार्यक्रम भी था।
नरम दल के तिलक जी के स्वागत में कम ध्यान दे रहे थे ।
कांग्रेस की स्वागतकारिणी समिति का यह प्रोग्राम था कि ट्रेन से तिलक जी को मोटरकार के द्वारा बिना जुलूस के ले जाया जावे।
बिस्मिल व अन्य युवा भी तिलक जी को सुनने को आतुर थे और उनके स्वागत हेतु स्टेशन पर आए हुए थे ।
जैसे ही गाड़ी आई स्वागत कारिणी समिति ने आगे होकर तिलक जी को घेरकर मोटरगाड़ी में बिठा लिया ।
बिस्मिल भावुक होकर मोटर कार के आगे लेट गए और कहे जा रहे थे ” मोटर मेरे ऊपर से निकाल ले जाओ”
” मोटर मेरे ऊपर से निकाल ले जाओ “।

एक अन्य युवक ने जोश में आकर मोटर कार का डायर काट दिया। लोकमान्य जी समझा रहे थे लेकिन युवा जोश के आगे कोई असर नहीं दिया।
युवाओं ने एक किराए की घोड़ागाड़ी ली व तिलक जी को बच्चे की तरह सिर से कंधों पर बैठा कर गाड़ी में बैठा दिया
और घोड़ागाड़ी से घोड़े को खोलकर बिस्मिल खुद ही गाड़ी को खींचने में लग गए ।
युवाओं ने अपने कंधों से घोड़ागाड़ी खींचते हुए तिलक जी को एक जुलूस के रूप में धूमधाम से लेकर गए । देखने योग्य जन समुदाय जुड़ा ।
इस कार्यक्रम का एक लाभ यह हुआ कि बिस्मिल का जोश देख कर कुछ क्रांतिकारीयों व गरम दल के नेताओं से बिस्मिल का संपर्क हुआ ।
बिस्मिल के क्रांतिकारी दल का नाम” हिदुस्तान, रिपब्लिकन एसोसिएशन ” था । जिसके नाम में कालांतर में भगतसिंह ने “सोशलिस्ट” शब्द और जोड़ा था।
शुरुआत में बिस्मिल ने हथियार खरीदने हेतु अपनी माताजी से ₹200 लेकर एक पुस्तक ” अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली’ लिखकर छपवाई पर इसमें मात्र ₹200 की बचत हुई ।
उसी समय संयुक्त प्रांत के सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी गेंदालाल जी दीक्षित को ग्वालियर में गिरफ्तार कर लिया ।
बिस्मिल ने “देशवासियों के नाम संदेश” शीर्षक से कई जिलों में पर्चे लगाए व वितरित किये।
क्रांतिकारियों के पास हथियारों की खरीद हेतु रुपयों की हमेशा ही कमी रही और देश में जहां कहीं भी क्रांतिकारी आंदोलन चल रहे थे सभी ने हथियारों के लिए
जमींदारों,सेठ साहूकारों के यहां डाके डाल कर रुपयों का इंतजाम किया।

व्यक्तिगत डाको से जन भावना खिलाफ होती थी तथा धन भी कम मिलता था ।इसलिए दल ने रेलवे का सरकारी खजाना लूटने का कार्यक्रम बनाकर ।
9 अगस्त 1925 को काकोरी एक्शन लिया व काकोरी के पास ट्रेन से सरकारी खजाना लूटा।
इस घटना से फ़िरंगियों की सरकार हिल गयी ।
काकोरी एक्शन के बारे में विस्तार से अलग लेख लिखा गया है।

एक बार बिस्मिल के अन्य साथी गंगा सिंह , राजाराम व देवनारायण ने कोलकाता में वायसराय की हत्या करने का कार्यक्रम बनाया । बिस्मिल इस कार्यक्रम से सहमत नहीं थे ।
इन तीनों ने तो बिस्मिल को ही ठिकाने लगाने का आयोजन कर दिया व इलाहाबाद के त्रिवेणी तट पर संध्या कर रहे बिस्मिल पर तीन गोलियां चलाई दो गोली निशाने पर नहीं लगी तीसरा कारतूस चला ही नहीं।
आजादी के खतरनाक मिशन में अपनी बहन को साथ लेना बलिदान की पराकाष्ठा है।
बिस्मिल अपनी बहन शास्त्री देवी की जांघो पर बंदूके बांधकर हथियार छिपाकर लाते थे ।
शास्त्री देवी ने कई बार इस प्रकार शाहजहांपुर हथियार पहुंचाए। किस लिए ?!
देश की आजादी के लिए !!


यह मकान जिसमें बिस्मिल व शास्त्री देवी ने अपना बचपन गुजारा एक राष्ट्रीय धरोहर बननी चाहिए थी पर अफसोस ऐसा नहीं हो हुआ।
बिस्मिल के बचपन के सहपाठी सुशीलचंद्र सेन के देहांत पर उनकी स्मृति में ‘ निहिलिस्ट रहस्य’ का अनुवाद करना शुरू किया और सुशील वाला के नाम से ग्रंथ वाला में “बोल्शेविकों की करतूत” व ” मैन की लहर” छपवाई ।

मैनपुरी में गेंदालाल जी दीक्षित के नेतृत्व में कुछ हथियार खरीद कर इकट्ठे किए गए थे । इस बात का पुलिस को पता चल गया और धड़ पकड़ शुरू हो गई।
एक साथी सोमदेव पुलिस मुखबिर बन गया सारे राज खुलने से गेंदालाल जी गिरफ्तार कर लिए गए व राम प्रसाद बिस्मिल फरार हो गए

।प्रथम महायुद्ध के बाद सरकार ने 20 फरवरी 1920 राजनीतिक कैदियों की माफ़ी की । इस घोषणा के होने से बिस्मिल का अज्ञातवास समाप्त हुआ।
बिस्मिल शाहजहांपुर वापस आए तो लोग उनसे मिलने से कतराने लगे दूर से ही नमस्ते करके चल देते थे लोगों को यह डर लगता था कि क्रांतिकारी के संपर्क से उनकी जान किसी खतरे में न पड़ जाए।
इसीलिए बिस्मिल ने कहा होगा-

“‘ इम्तहां सबका कर लिया हमने,
सारे आलम को आजमा देखा ।
नजर आया न कोईअपनाअजीज,
आंख जिसकी तरफ उठा देखा।। कोई अपना ना निकला महरमे राज,
जिसको देखा तो बेवफा देखा । अलगरज सबको इस जमाने में अपने मतलब का आशना देखा।।”‘

काकोरी एक्शन के बाद बिस्मिल गोरखपुर जेल में रहे व इसी जेल में दिनाँक 19 दिशम्बर 1927 को बिस्मिल को फाँसी दी गयी थी।
फांसी से एक दिन पूर्व बिस्मिल की माताजी बिस्मिल से मिलने जेल में गई । माँ को देख कर बिस्मिल मां के पैर छूकर गले से लिपटा तो बिस्मिल की आँखों मे आंशू आ गए ।
माँ ने कहा मैं तो समझती थी मेरा बेटा बहादुर है। जिसके नाम से अंग्रेज सरकार भी कांपती है ।
बिस्मिल ने बड़ी श्रद्धा से कहा ये आंशू मौत के डर से नहीं है मां
ये तो माँ के प्रति मोह के है।
मैं मौत से मैं नहीं डरता मां तुम विश्वास करो ।
तभी माँ ने शिवराम वर्मा का हाथ पकड़कर आगे कर दिया और बिस्मिल से कहा यह तुम्हारे आदमी है पार्टी के बारे में जो भी चाहो ,इनसे कह सकते हो।
धन्य जननी , जो एकमात्र बेटे की फांसी से एक दिन पहले क्रांतिकारी दल का सहयोग कर रही है।
ऐसी कोख़ से ही ऐसा वीर जन्म लेता है।।
फाँसी वाले दिन भी बिस्मिल हमेशा की तरह सो कर उठे, स्नान किया, वंदना की और धोती कुर्ता पहनकर जेल के सभी अधिकारियों, कर्मचारियों एवं अन्य बंदियों से हंस-हंसकर बातें करते हुए चल पड़े ।
भारत माता की जय
वंदे मातरम के नारे लगाते हुए फांसी के तख्ते के समीप पहुंचकर स्वयं ही फांसी के तख्ते पर चढ गए और कहा
“मालिक तेरी रजा रहे और तू ही तू रहे ।
बाकी ने मैं रहूं , न मेरी आरजू रहे।।
जब तक कि तन में जान ,
रगों में लहू रहे।
तेरा ही जिक्र या तेरी ही जुस्तजू रहे।।
उसके पश्चात जोर से कहा
I wish the downfall of British Empire
फिर मंत्र जप कर कहा-
मरते’ बिस्मिल, ‘ ‘लाहरी, ‘अश्फाक’ अत्याचार से ।
होंगे पैदा सैकड़ों इनके रुधिर की धार से।।
और अंतिम बार धरती माता को प्रणाम किया धूली को माथे पर चंदन की तरह लगाया और वंदेमातरम कहते हैं फंदे से झूल गए।
शत शत नमन क्रांतिवीर को।

:- चंद्र शेखर ‘आज़ाद’ -:

स्वतंत्रता संग्राम के अजेय योद्धा चन्द्रशेखर का जन्म गांव भाँवरा तहसील झाबुआ तत्कालीन अलीपुर रियासत में दिनांक जुलाई 1906 कोहुआथा।
चंद्र शेखर के पिता पंडित सीताराम तिवारी आर्थिक रूप से कमजोर थे। आज़ाद का जन्म एक झोम्पड़ी में हुआ थ।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय बाराणसी में 13 से 15 वर्ष की आयु के बच्चों के एक जुलूस को पुलिस ने तितर -बितर कर उनके नेता को पकड़ कर मजिस्ट्रेट के पास पेश किया गया बाल नेता की आयु भी लगभग 12 वर्ष थी।
मजिस्ट्रेट ने बालक से उसका नाम पूछा तो बताया “आजाद”।
दूसरा प्रश्न में पिता का पूछा नाम तो बालक ने बताया “स्वाधीनता’
मजिस्ट्रेट तीसरे प्रश्न में मजिस्ट्रेट ने निवास स्थान पूछा तो बालक ने कहा “जेलखाना “।
इस तरह के उत्तर सुनकर मजिस्ट्रेट ने बालक को 15 बेंते लगाने की सजा दी।
बालक को बांधकर बेंते लगाई गई। बेंत पड़ने के साथ ही बच्चे ने निडर होकर नारे लगाए , “महात्मा गांधी जी की जय”। बालक बेहोश हो गया।
सजा के बाद बालक का शहर में अभिनंदन हुआ । कद छोटा था इसलिए भीड़ को दिखाने के लिए मेज पर खड़ा किया गया ।
इस घटना से बच्चे ने अपनी पहचान खुद बनाई थी जिसे हम “आज़ाद ” से जानते है। आज़ाद नाम सुनते ही फ़िरंगियों व पुलिस की घिग्घी बंध जाती थी।
गांधीजी द्वरा असहयोग आंदोलन वापस लिए जाने के बाद वही वीर बालक जो बेंते खाते समय महात्मा गांधी की जय बोल रहा था ।गांधी आंदोलन से हटकर क्रांतिपथ की ओर चला।
उन दिनों सुरेश भट्टाचार्य बनारस में “कल्याण आश्रम ‘ के नाम से एक क्रांतिकारी संस्था चला रहे थे। शचींद्र सान्याल उतरी भारत आये हुए थे । इस समिति का विलय कर” हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन” क्रांतिकारी दल का गठन हुआ। इसका बनारस में नेतृत्व शचिंद्र नाथ बक्शी तथा राजेंद्र लाहिड़ी ने किया ।
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में दल का नेतृत्व पंडित राम प्रसाद बिस्मिल कर रहे थे ।
दल में अशफाक उल्ला खान , मन्मथ नाथ गुप्त, ठाकुर रोशन सिंह, रामकृष्ण खत्री, दामोदर सेठ ,भूपेंद्र सान्याल आदि लोग भी शामिल थे। दल का उद्देश्य सशस्त्र क्रान्ति से अंग्रेजों को भारत से निकालना था।
इसी दल द्वारा 9 अगस्त 1925 को सफलता पूर्वक फ़िरंगियों का खजाना लूटा गया। इस घटना को काकोरी एक्शन के नाम से जानिए।काकोरी एक्शन में सबसे कम आयु के क्रांतिकारी आज़ाद जी थे।जो कभी गिरफ्तार नहीं हुए।
इसी दल द्वारा 31 दिसंबर 1926 को वायसराय इरविन की गाड़ी को बम्ब से उड़ाया था। पर दुर्भाग्य से इरविन बच गया ।
फ़रारी के समय आज़ाद जी झांसी के ओरछा के जंगलो में हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से गुप्त रूप से संगठन को तैयार करते रहे।
और 8 सितंबर 1929 को दिल्ली के फिरोज शाह कोटला मैदान में क्रांतिकारियों की एक गुप्त सभा हुई व हिदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन में भगत सिंह ने ‘सोशलिस्ट ‘ शब्द और जोड़ा गया ।इसकी प्रचार शाखा का काम भगतसिंह व आर्मी शाखा का काम कमांडर- इन- चीफ़आज़ाद जी संभालते थे।
साइमन कमीशन 20 अक्टूबर 1928 को लाहौर आया जिसका काले झंडे दिखाकर विरोध किया गया। इस प्रदर्शन में इस दल के लोग साथ थे। पुलिस ने लाठीचार्ज किया लाला लाजपतराय को गंभीर चोटे आई जिससे लाला जी का दिनाँक17 नवम्बर 1928 को देहान्त हो गया।
पंजाब के ही नहीं पूरे देश के क्रांतिकारियों ने लाला जी की मृत्यु को राष्ट्रीय अपमान माना और इस अपमान का बदला आज़ाद जी के नेतृत्व में भगतसिंह, राजगुरु ने दिनांक 17 दिसंबर 1928 को सांडर्स का वध करके लिया था।
इसी दल की तरफ से शहीदेआजम भगतसिंह की योजना के अनुसार 8 अप्रैल 1929 को असेंबली में नकली बम डालकर अंग्रेजी कुशासन की बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाई गई थी।
इसके बाद भगत सिंह राजगुरु, सुखदेव की गिरफ्तारी हो गयी कुछ लोग सरकारी गवाह बन गए।

संगठन बिखर गया । गांधीजी व कांग्रेस ने आज़ाद जी की कोई सहायता नहीं की।
आज़ाद जी ने गदरपार्टी के पुराने क्रांतिकारी पृथ्वी सिंह जी से सम्पर्क किया जिहोंने भगतसिंह व साथियों को जेल से बाहर निकालने की जुम्मेवारी ली।
इसी योजना के संबंध में दिनाँक 27 फरवरी 1931 को आज़ाद जी अल्फ्रेड पार्क में थे ।
किसी देशद्रोही ने पुलिस को ख़बर कर दी ऐतिहासिक मुठभेड़ हुई और आज़ाद जी ने अपने ही माउजर की आखिरी गोली से आत्म बलिदान किया।
आजाद जी हमेशा कहते थे
” दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे,
आजादी ही रहे हैं आज़ाद ही रहेंगे ।”
और अपने माउजर पर हाथ रखकर कहते थे
“जब तक यह बम- तूरू- बुखारा मेरे पास है, तब तक कोई माई का लाल मुझे पकड़ नहीं सकता। मैं आजाद हूं। आजाद ही रहूंगा ।
आज़ाद जी के जीवन के कुछ किस्से इस प्रकार है।
आज़ाद जी महिलाओं का बहुत सम्मान करते । एक बार डाका एक्शन में एक तकड़ी महिला ने चंद्रशेखर आजाद का हाथ पकड़ लिया भैयाजी ने हाथ छुड़ाने के लिए महिला पर जोर नहीं आजमा रहे थे इतने में बिस्मिल आये व छुड़ा कर ले गए।

एक बार रामकृष्ण खत्री ने धन प्राप्त की योजना बनाकर आज़ाद जी को गाजीपुर में एक उदासियां महंत का शिष्य बना दिया। योजना थी कि महंत वृद्ध है मरते ही डेरा अपना। आजाद जी ने कुछ दिन बाद वहाँ रहने से मना कर दिया। मन्मथ नाथ गुप्त व खत्री जी मिलने गए तो आज़ाद जी व्यथा सुनाते हुए कहा । यह साला महंत अभी मरने वाला नहीं है ,खूब दूध पीता है । यह दोनों शीघ्र बुलाने का आश्वासन देकर आ गए एक-दो दिन तो आज़ाद जी इंतजार किया फिर मौका देख कर बिना सूचना के ही मठ छोड़ कर निकल आए ।
एक असहयोग आंदोलन के समय लड़कियों ने चूड़ी आंदोलन शुरू कर रखा था । लड़कियां चूड़ियां लेकर सड़कों पर घूमती थी और जो भी युवापुरूष दिखाई देता उसे चूड़ियां पहना कर कहती है आजादी की लड़ाई लड़ नहीं सकते तो चूड़िया पहन कर बैठ जाओ।
बहनों का एक दिन आजाद जी से सामना हो गया उन्होंने पकड़ा हाथ और चूड़ियां डालने लगी कई ।वो आज़ाद का हाथ था चूड़ियां छोटी थी । आज़ाद जी कहा बहन ऐसी चूड़ी नही बनी जी मेरे हाथ में पहनाई जा सके।
आजाद जी का मूंछो पर ताव लगाते हुए जो फ़ोटो हम देखते है ।यह फ़ोटो मास्टर रूद्र नारायण सिंह जो चित्रकार व फोटोग्राफर भी थे ने लिया था। मास्टर जी ने आज़ाद जी कहा मुझे तुम्हारा फ़ोटो खिंचने दो । आज़ाद जी ने कहा मूंछो पर ताव लगाने दो ।इधर से आजाद जी ने मूंछो पर ताव लगाने हेतु हाथ लगाया कि मास्टर जी ने कैमरा क्लिक कर दिया । आज यह फ़ोटो राष्ट्र की थाती है।

एक घटना जिसे सुनकर आंखे भर आती है यह जानकर आज़ाद जी क्या थे !
हुआ यह कि एकबार गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने आज़ाद जी को 200 रुपये माता जी को घर भेजने हेतु दिये । दल में खाने के लिये रुपये नहीं थे इसलिये आजाद जी ने वो राशि दल के लिए खर्च करदी ।
जब पूछा गया कि माँ को रुपये क्यों नहीं भेजे तो आज़ाद जी उतर सुनकर आप सोच सकेंगें की ऐसा महान क्रांतिकारी शायद ही कोई दूसरा हुआ हो ।
आज़ाद जी ने कहा उस बूढ़ी के लिए पिस्तौल की दो गोलीयां काफी है। विद्यार्थी जी , इस गुलाम देश में लाखों परिवार ऐसे है जिन्हें एक समय भी रोटी नसीब नहीं होती । मेरी माता दो दिन से एक बार तो भोजन पा ही जाती है, वे भूखी रह सकती है,पर पैसे के लिए पार्टी के सदस्यों को भूख नहीं मरने दूंगा।उनकी आवश्यकताओं को पूरा करना सर्वप्रथम कर्तव्य है। मेरे माता पिता भूखे मर भी गए तक उससे देश को कोई नुकसान नहीं होगा,एसे कितने ही इसमें मरते जीते हैं।””
शत शत नमन।•

20-20
गोरखा बिगुलर ने बिगुल फूँका। कमरबन्दी में मुस्तैद 40 जवानों ने 0 गोलियाँ बंडोलियर में रखीं और अपने-अपने .410 बोर मास्कट सँभाले । रिवाल्वर लोड किये और 18-18 स्पेयर राउण्ड्स पाउचों के हवाले किये। फिर शेष 40 ने लाठियाँ थामीं। टिटर्टन और हैरिस ने भी अपने-अपने वेब्ले-स्काट चार गाड़ियों में बैठकर सब एलफ्रेड पार्क की ओर रवाना हुए। •
प्रातः 9 बजे आनन्द भवन में जवाहरलाल नेहरू से भेंट करने के पश्चात् चन्द्रशेखर आज़ाद सुखदेवराज को साथ लिए एलफ्रेड पार्क पहुँचे थे। छिन्न-भिन्न हो रही पार्टी के सम्बन्ध में आवश्यक निर्णय लेने थे। दोनों एक बड़े से जामुन के पेड़ के नीचे इन गम्भीर मसलों पर विचार-विमर्श करने बैठ गये। विश्वविद्यालय से आने वाले एक ‘कोरियर’ का भी इन्तज़ार था। शायद, कोई ज़रूरी पत्र या समाचार ला रहा हो। उसे ठीक साढ़े नौ बजे यहीं पार्क में मिलने का आदेश था।
यशपाल से इशारा मिलने पर वीरभद्र तिवारी ने दोनों को एलफ्रेड पार्क में एक जामुन के पेड़ के नीचे बैठे देखा था।
वह तुरन्त शम्भूनाथ के पास पहुँचा और छूटते ही बोला, “पंडित जी एलफ्रेड पार्क में हैं। जल्दी कीजिये ।एस. पी., एस. बी. जॉन नॉटबावर तुरन्त अपनी कार से एलफ्रेड पार्क पहुँचा। हथियारों से लैस पुलिस ने पार्क को तीन तरफ से घेर लिया। पुलिस कप्तान मैज़र्स के साथ डिप्टी कमिश्नर बमफोर्ड पार्क के बाहर ही रहे।
मौसम सर्द था । हवा भी तेज़ थी । चन्द्रशेखकर आज़ाद खद्दर की धोती, कमीज़ और ठंडी सदरी पहने (उनके पास गरम कपड़े थे ही नहीं) सुखदेवराज के साथ संजीदगी से बातें कर रहे थे। अचानक नॉटबावर वहाँ पहुँचा और कार से उतरते-उतरते आज़ाद को देखते ही गोली दाग दी। गोली निशाने पर लगी और उनकी दाहिनी जाँघ को चीरती हुई हड्डी तोड़कर निकल गयी। (.455 बोर की गोली थी, जिससे अच्छे-अच्छे जानवर भी क्षण-भर में बिलट जाते हैं। आदमी की तो बिसात ही क्या !)
आज़ाद को पूरी स्थिति भाँपते देर न लगी। उन्होंने सुखदेवराज को शीघ्र की वहाँ से खिसक जाने का संकेत किया। (शायद, स्वयं भी घेरे से निकल भागने में कामयाब हो जाते, यदि नॉटबावर की पहली गोली से उनकी जाँघ की हड्डी
कुछ अधखुले पन्ने

”सहित 15 मिनट के अन्दर एलफ्रेड पार्क घेर लेने का आदेश मिला। गोली चलने
की पूरी-पूरी आशंका भी व्यक्त की गयी।
तुरन्त

पूरी तैयारी तो थी ही । मैज़र्स को फोन खटखटाया गया आर्ल्ड फोर्स के लिए।
31

:- चंद्र शेखर ‘आज़ाद’ -:

जन्म – 23 जुलाई 1906
शहादत- 27 फरवरी 1931
:- स्वतंत्रता संग्राम
के
अजेय योद्धा
चन्द्रशेखर का जन्म गांव भाँवरा तहसील झाबुआ तत्कालीन अलीपुर रियासत में हुआ था।
चंद्र शेखर के पिता पंडित सीताराम तिवारी आर्थिक रूप से कमजोर थे। आज़ाद का जन्म एक झोम्पड़ी में हुआ थ।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय बाराणसी में 13 से 15 वर्ष की आयु के बच्चों के एक जुलूस को पुलिस ने तितर -बितर कर उनके नेता को पकड़ कर मजिस्ट्रेट के पास पेश किया गया बाल नेता की आयु भी लगभग 12 वर्ष थी।
मजिस्ट्रेट ने बालक से उसका नाम पूछा तो बताया “आजाद”।
दूसरा प्रश्न में पिता का पूछा नाम तो बालक ने बताया “स्वाधीनता’
मजिस्ट्रेट तीसरे प्रश्न में मजिस्ट्रेट ने निवास स्थान पूछा तो बालक ने कहा “जेलखाना “।
इस तरह के उत्तर सुनकर मजिस्ट्रेट ने बालक को 15 बेंते लगाने की सजा दी।
बालक को बांधकर बेंते लगाई गई। बेंत पड़ने के साथ ही बच्चे ने निडर होकर नारे लगाए , “महात्मा गांधी जी की जय”। बालक बेहोश हो गया।
सजा के बाद बालक का शहर में अभिनंदन हुआ । कद छोटा था इसलिए भीड़ को दिखाने के लिए मेज पर खड़ा किया गया ।
इस घटना से बच्चे ने अपनी पहचान खुद बनाई थी जिसे हम “आज़ाद ” से जानते है। आज़ाद नाम सुनते ही फ़िरंगियों व पुलिस की घिग्घी बंध जाती थी।
गांधीजी द्वरा असहयोग आंदोलन वापस लिए जाने के बाद वही वीर बालक जो बेंते खाते समय महात्मा गांधी की जय बोल रहा था ।गांधी आंदोलन से हटकर क्रांतिपथ की ओर चला।
उन दिनों सुरेश भट्टाचार्य बनारस में “कल्याण आश्रम ‘ के नाम से एक क्रांतिकारी संस्था चला रहे थे। शचींद्र सान्याल उतरी भारत आये हुए थे । इस समिति का विलय कर” हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन” क्रांतिकारी दल का गठन हुआ। इसका बनारस में नेतृत्व शचिंद्र नाथ बक्शी तथा राजेंद्र लाहिड़ी ने किया ।
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में दल का नेतृत्व पंडित राम प्रसाद बिस्मिल कर रहे थे ।
दल में अशफाक उल्ला खान , मन्मथ नाथ गुप्त, ठाकुर रोशन सिंह, रामकृष्ण खत्री, दामोदर सेठ ,भूपेंद्र सान्याल आदि लोग भी शामिल थे। दल का उद्देश्य सशस्त्र क्रान्ति से अंग्रेजों को भारत से निकालना था।
इसी दल द्वारा 9 अगस्त 1925 को सफलता पूर्वक फ़िरंगियों का खजाना लूटा गया। इस घटना को काकोरी एक्शन के नाम से जानिए।काकोरी एक्शन में सबसे कम आयु के क्रांतिकारी आज़ाद जी थे।जो कभी गिरफ्तार नहीं हुए।
इसी दल द्वारा 31 दिसंबर 1926 को वायसराय इरविन की गाड़ी को बम्ब से उड़ाया था। पर दुर्भाग्य से इरविन बच गया ।
फ़रारी के समय आज़ाद जी झांसी के ओरछा के जंगलो में हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से गुप्त रूप से संगठन को तैयार करते रहे।
और 8 सितंबर 1929 को दिल्ली के फिरोज शाह कोटला मैदान में क्रांतिकारियों की एक गुप्त सभा हुई व हिदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन में भगत सिंह ने ‘सोशलिस्ट ‘ शब्द और जोड़ा गया ।इसकी प्रचार शाखा का काम भगतसिंह व आर्मी शाखा का काम कमांडर- इन- चीफ़आज़ाद जी संभालते थे।
साइमन कमीशन 20 अक्टूबर 1928 को लाहौर आया जिसका काले झंडे दिखाकर विरोध किया गया। इस प्रदर्शन में इस दल के लोग साथ थे। पुलिस ने लाठीचार्ज किया लाला लाजपतराय को गंभीर चोटे आई जिससे लाला जी का दिनाँक17 नवम्बर 1928 को देहान्त हो गया।
पंजाब के ही नहीं पूरे देश के क्रांतिकारियों ने लाला जी की मृत्यु को राष्ट्रीय अपमान माना और इस अपमान का बदला आज़ाद जी के नेतृत्व में भगतसिंह, राजगुरु ने दिनांक 17 दिसंबर 1928 को सांडर्स का वध करके लिया था।
इसी दल की तरफ से शहीदेआजम भगतसिंह की योजना के अनुसार 8 अप्रैल 1929 को असेंबली में नकली बम डालकर अंग्रेजी कुशासन की बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाई गई थी।
इसके बाद भगत सिंह राजगुरु, सुखदेव की गिरफ्तारी हो गयी कुछ लोग सरकारी गवाह बन गए।

संगठन बिखर गया । गांधीजी व कांग्रेस ने आज़ाद जी की कोई सहायता नहीं की।
आज़ाद जी ने गदरपार्टी के पुराने क्रांतिकारी पृथ्वी सिंह जी से सम्पर्क किया जिहोंने भगतसिंह व साथियों को जेल से बाहर निकालने की जुम्मेवारी ली।
इसी योजना के संबंध में दिनाँक 27 फरवरी 1931 को आज़ाद जी अल्फ्रेड पार्क में थे ।
किसी देशद्रोही ने पुलिस को ख़बर कर दी ऐतिहासिक मुठभेड़ हुई और आज़ाद जी ने अपने ही माउजर की आखिरी गोली से आत्म बलिदान किया।
आजाद जी हमेशा कहते थे
” दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे,
आजादी ही रहे हैं आज़ाद ही रहेंगे ।”
और अपने माउजर पर हाथ रखकर कहते थे
“जब तक यह बम- तूरू- बुखारा मेरे पास है, तब तक कोई माई का लाल मुझे पकड़ नहीं सकता। मैं आजाद हूं। आजाद ही रहूंगा ।
आज़ाद जी के जीवन के कुछ किस्से इस प्रकार है।
आज़ाद जी महिलाओं का बहुत सम्मान करते । एक बार डाका एक्शन में एक तकड़ी महिला ने चंद्रशेखर आजाद का हाथ पकड़ लिया भैयाजी ने हाथ छुड़ाने के लिए महिला पर जोर नहीं आजमा रहे थे इतने में बिस्मिल आये व छुड़ा कर ले गए।

एक बार रामकृष्ण खत्री ने धन प्राप्त की योजना बनाकर आज़ाद जी को गाजीपुर में एक उदासियां महंत का शिष्य बना दिया। योजना थी कि महंत वृद्ध है मरते ही डेरा अपना। आजाद जी ने कुछ दिन बाद वहाँ रहने से मना कर दिया। मन्मथ नाथ गुप्त व खत्री जी मिलने गए तो आज़ाद जी व्यथा सुनाते हुए कहा । यह साला महंत अभी मरने वाला नहीं है ,खूब दूध पीता है । यह दोनों शीघ्र बुलाने का आश्वासन देकर आ गए एक-दो दिन तो आज़ाद जी इंतजार किया फिर मौका देख कर बिना सूचना के ही मठ छोड़ कर निकल आए ।
एक असहयोग आंदोलन के समय लड़कियों ने चूड़ी आंदोलन शुरू कर रखा था । लड़कियां चूड़ियां लेकर सड़कों पर घूमती थी और जो भी युवापुरूष दिखाई देता उसे चूड़ियां पहना कर कहती है आजादी की लड़ाई लड़ नहीं सकते तो चूड़िया पहन कर बैठ जाओ।
बहनों का एक दिन आजाद जी से सामना हो गया उन्होंने पकड़ा हाथ और चूड़ियां डालने लगी कई ।वो आज़ाद का हाथ था चूड़ियां छोटी थी । आज़ाद जी कहा बहन ऐसी चूड़ी नही बनी जी मेरे हाथ में पहनाई जा सके।
आजाद जी का मूंछो पर ताव लगाते हुए जो फ़ोटो हम देखते है ।यह फ़ोटो मास्टर रूद्र नारायण सिंह जो चित्रकार व फोटोग्राफर भी थे ने लिया था। मास्टर जी ने आज़ाद जी कहा मुझे तुम्हारा फ़ोटो खिंचने दो । आज़ाद जी ने कहा मूंछो पर ताव लगाने दो ।इधर से आजाद जी ने मूंछो पर ताव लगाने हेतु हाथ लगाया कि मास्टर जी ने कैमरा क्लिक कर दिया । आज यह फ़ोटो राष्ट्र की थाती है।

एक घटना जिसे सुनकर आंखे भर आती है यह जानकर आज़ाद जी क्या थे !
हुआ यह कि एकबार गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने आज़ाद जी को 200 रुपये माता जी को घर भेजने हेतु दिये । दल में खाने के लिये रुपये नहीं थे इसलिये आजाद जी ने वो राशि दल के लिए खर्च करदी ।
जब पूछा गया कि माँ को रुपये क्यों नहीं भेजे तो आज़ाद जी उतर सुनकर आप सोच सकेंगें की ऐसा महान क्रांतिकारी शायद ही कोई दूसरा हुआ हो ।
आज़ाद जी ने कहा उस बूढ़ी के लिए पिस्तौल की दो गोलीयां काफी है। विद्यार्थी जी , इस गुलाम देश में लाखों परिवार ऐसे है जिन्हें एक समय भी रोटी नसीब नहीं होती । मेरी माता दो दिन से एक बार तो भोजन पा ही जाती है, वे भूखी रह सकती है,पर पैसे के लिए पार्टी के सदस्यों को भूख नहीं मरने दूंगा।उनकी आवश्यकताओं को पूरा करना सर्वप्रथम कर्तव्य है। मेरे माता पिता भूखे मर भी गए तक उससे देश को कोई नुकसान नहीं होगा,एसे कितने ही इसमें मरते जीते हैं।””
शत शत नमन।•

20-20
गोरखा बिगुलर ने बिगुल फूँका। कमरबन्दी में मुस्तैद 40 जवानों ने 0 गोलियाँ बंडोलियर में रखीं और अपने-अपने .410 बोर मास्कट सँभाले । रिवाल्वर लोड किये और 18-18 स्पेयर राउण्ड्स पाउचों के हवाले किये। फिर शेष 40 ने लाठियाँ थामीं। टिटर्टन और हैरिस ने भी अपने-अपने वेब्ले-स्काट चार गाड़ियों में बैठकर सब एलफ्रेड पार्क की ओर रवाना हुए। •
प्रातः 9 बजे आनन्द भवन में जवाहरलाल नेहरू से भेंट करने के पश्चात् चन्द्रशेखर आज़ाद सुखदेवराज को साथ लिए एलफ्रेड पार्क पहुँचे थे। छिन्न-भिन्न हो रही पार्टी के सम्बन्ध में आवश्यक निर्णय लेने थे। दोनों एक बड़े से जामुन के पेड़ के नीचे इन गम्भीर मसलों पर विचार-विमर्श करने बैठ गये। विश्वविद्यालय से आने वाले एक ‘कोरियर’ का भी इन्तज़ार था। शायद, कोई ज़रूरी पत्र या समाचार ला रहा हो। उसे ठीक साढ़े नौ बजे यहीं पार्क में मिलने का आदेश था।
यशपाल से इशारा मिलने पर वीरभद्र तिवारी ने दोनों को एलफ्रेड पार्क में एक जामुन के पेड़ के नीचे बैठे देखा था।
वह तुरन्त शम्भूनाथ के पास पहुँचा और छूटते ही बोला, “पंडित जी एलफ्रेड पार्क में हैं। जल्दी कीजिये ।एस. पी., एस. बी. जॉन नॉटबावर तुरन्त अपनी कार से एलफ्रेड पार्क पहुँचा। हथियारों से लैस पुलिस ने पार्क को तीन तरफ से घेर लिया। पुलिस कप्तान मैज़र्स के साथ डिप्टी कमिश्नर बमफोर्ड पार्क के बाहर ही रहे।
मौसम सर्द था । हवा भी तेज़ थी । चन्द्रशेखकर आज़ाद खद्दर की धोती, कमीज़ और ठंडी सदरी पहने (उनके पास गरम कपड़े थे ही नहीं) सुखदेवराज के साथ संजीदगी से बातें कर रहे थे। अचानक नॉटबावर वहाँ पहुँचा और कार से उतरते-उतरते आज़ाद को देखते ही गोली दाग दी। गोली निशाने पर लगी और उनकी दाहिनी जाँघ को चीरती हुई हड्डी तोड़कर निकल गयी। (.455 बोर की गोली थी, जिससे अच्छे-अच्छे जानवर भी क्षण-भर में बिलट जाते हैं। आदमी की तो बिसात ही क्या !)
आज़ाद को पूरी स्थिति भाँपते देर न लगी। उन्होंने सुखदेवराज को शीघ्र की वहाँ से खिसक जाने का संकेत किया। (शायद, स्वयं भी घेरे से निकल भागने में कामयाब हो जाते, यदि नॉटबावर की पहली गोली से उनकी जाँघ की हड्डी
कुछ अधखुले पन्ने

”सहित 15 मिनट के अन्दर एलफ्रेड पार्क घेर लेने का आदेश मिला। गोली चलने
की पूरी-पूरी आशंका भी व्यक्त की गयी।
तुरन्त

पूरी तैयारी तो थी ही । मैज़र्स को फोन खटखटाया गया आर्ल्ड फोर्स के लिए।
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    वासुदेव बलवंत फड़के –

  -: सिंह क्रांति पुरुष :-
      -:- वासुदेव बलवंत फड़के -:-
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 को दबा दिए जाने के बाद  ब्रिटिश क्रूर शासन से भारत को स्वतंत्र कराने के लिए सबसे पहले सशस्त्र क्रांति वासुदेव फड़के ने की ।
फड़के का जन्म 4 नवंबर 1844 को गांव शिरढोण जिला कुलाबा महाराष्ट्र में हुआ था ।
फ़ड़के 1860 में पहले सरकारी कर्मचारी लगे थे। पर ब्रिटिश सरकार  के निर्दयता पूर्ण कार्यो से दुःखी रहते थे । फड़के की माता जी के देहांत पर उन्हें अवकाश नहीं दिए जाने पर फड़के ने नोकरी छोड़ दी व ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध युद्ध की तैयारियों में लग गए।
  फड़के जंगल में व्यायामशाला संचालित करते थे जिसमें अस्त्र-शस्त्र चलाना , घुड़सवारी करना सिखाते थे व गुरिल्ला युद्ध की तैयारी करवाते थे।
  फड़के को शिक्षित लोगों  का सहयोग नहीं मिला । फड़के ने बहादुर  खामोशी जाति के लोगों की एक सेना तैयार और इसे घने जंगल व पहाड़ों से घीरे क्षेत्र में गुरिल्ला युद्ध मे दक्ष किया।
महाराष्ट्र में अकाल के कारण गरीब व आदिवासी जनता भूखे से मरने लगी पर फ़िरंगी सरकार के अधिकारीयों की लूट में कोई कमी नहीं आयी । भुखमरी से परेशान लोगों को   फड़के ने भूख की बजाय बहादुरी की मौत मरने का पाठ पढ़ाया ।
फड़के शस्त्र खरीदने , अपनी सेना के खर्चों व गरीब जनता की सहायता हेतु खून चूसने वाले जमीदारों ,सेठों व  सरकारी दफ्तरों व खजानॉन को लूटना शुरू किया व गरीबों की सहायता  भी की तथ लड़ाई जारी रखी ।
फड़के ने  फरवरी 1879 में अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करते हुए अपने दल का एक घोषणा पत्र तैयार कर लोगों को क्रांतिकारी सरकार बनाने के विचार व दर्शन को समझाया ।
फड़के के नाम से फिरंगी सरकार हिल गई और मुंबई में क्रूर अधिकारियों की  नियुक्ति की । मेजर डेनियल ने फड़के को जिंदा या मुर्दा गिरफ्तारी करने वाले को इनाम की घोषणा की फड़के ने इसकी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मुंबई के गवर्नर रिजल्ट टेंपल, पुणे के मजिस्ट्रेट सेशन जज व अन्य अधिकारियों का सर काट कर लाने वालों को इनाम देने की घोषणा करते हुए शहर में इश्तिहार चिपकवा दिए।
फड़के ने 1874 में घामरी व तोरण की किलो पर कब्जा कर लिया।
अंग्रेजों के खूंखार सेनाअधिकारी मेजर डेनियल को तुलसीघाटी में आमने-सामने की लड़ाई हुई छक्के छुड़ा दिए ।
एक बार तो फड़के ने पुणे की अदालत में ही आग लगा दी थी।
फड़के का गणेश जोशी  व महादेव गोविंद रानाडे से संपर्क था ।
फड़के द्वारा संचालित व्यामशाला में बाल गंगाधर तिलक भी जाते। फड़के 20 जुलाई 1879 को  देवनागरीमांगी गांव के एक बोध मठ में आराम कर रहे थे सूचना होने पर घेर लिए गए सोते हुए शेर को गिरफ्तार कर लिया गया।
फ़ड़के अपना नाम व वेश बदलकर काशीराम बाबाके छदम नाम से  रहते थे। फड़के पर देशद्रोह का मुकदमा चलाया गया और उन्हें आजीवन काले पानी की सजा दी गई  । मुकदमा में फ़ड़के की पैरवी श्री महादेव आप्टे ने की । फड़के समझदार व देशभक्त थे ।
फड़के ने भरी अदालत में सिंह गर्जना करते हुए कहा
“” हम भारत माता के पुत्र आज घृणा की वस्तु बन चुके हैं। परतंत्रता की इस लज्जा जनक अवस्था में मृत्यु कहीं हजार गुना अच्छी है। स्वतंत्र भारत का जनतंत्र स्थापित करना मेरे हृदय की आकांक्षा हैं।
मैं स्वीकार करता हूं की मैंने अपने भाषणों में अंग्रेजों की हत्या करने और अंग्रेजी साम्राज्य को नष्ट भ्रष्ट करने का उपदेश दिया “”
फड़के को आजीवन कारावास का दण्ड देकर अंडमान जेल में भेजा जाना था  लोगों को इसकी खबर लग गई । जिस  रेलगाड़ी से फड़के को ले जाया जा  रहा था वो रेलगाड़ी जिस स्टेशन से गुजरती लोग हर स्टेशन पर फ़ड़के का फूलमालाओं व जयकारों से स्वागत करते थे ।
ज़ोरदार बात यह रही कि एक ब्रिटिश महिलाएं  श्रीमती हिगस ने फड़के को गुलदस्ता भेंट किया।
फड़के को दिए जा रहे सम्मान से सरकार इस कदर डर गई थी की फड़के को अंडमान जैल में भेजने की बजाय प्रायद्वीप की अदन जेल में भेज दिया ।
जेल में फड़के को अमानवीय यातनाएं दी गई
उल्टा लटकाकर  गर्म सलाखों से दागा गया । एक बार फड़के जेल भाग भी गए पर पकड़े गए । जेल खाना भी अच्छा नहीं दिया जाता था । फड़के ने जेल में अनशन भी किया लेकिन इसका  दुष्ट सरकार पर कोई असर नहीं हुआ ।
फड़के क्षय रोग से ग्रस्त हो गए व  17 फ़रवरी 1883 को स्वर्ग  सिधार गए ।

शत शत नमन शहीदों को ।

क्रांति वीरांगना ननिबाला देवी

उनके पिता का नाम श्री सूर्यकांत बनर्जी और माता का नाम गिरिवाला देवी था।
ननिबाला  का विवाह 11 वर्ष की आयु में ही  हो गया था । विवाह के 5 वर्ष  बाद उनके पति का देहांत हो गया.
क्रांति वीरांगना ननिबाला का जन्म1888 में हावड़ा जिला के गांव बाली में हुआ था।

ननिबाला के भतीजे अमरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय युगांतर क्रांतिकारी दल के सदस्य थे।

उनके कारण ननिबाला भी क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लेने लगी ।
प्रथम महायुद्धके समय बंगाल में जतिन बाघा के नेतृत्व में क्रांतिकारी गतिविधियां चर्म पर थी।
ननिबाला बंगाल के क्रांतिकारियों को अपने घर में आश्रय देती, उनके अस्त्र-शस्त्र  छुपा कर रखती थी।
उन दिनों पुलिस ने कलकत्ता के श्रमजीवी समवाय संस्थान से क्रांतिकारी नेता रामचंद्र मजूमदार  को गिरफ्तार  कर लिया ।
रामचंद्र  ने अपने पिस्तौल के कहीं छिपा दिया था जिसका पता लगाना जरूरी था।
  क्रांतिकारियों के लिए एक पिस्तौल  भी  महत्वपूर्ण थी। 
ननिबाला  रामचंद्र की पत्नी बन कर जेल में गई व रामचंद्र से पिस्तौल व अन्य जानकारियां लेकर आई।
ननिबाला पुलिस की नज़र में आ गई।
बाघा जतिन की शहादत के बाद जादू गोपाल मुखर्जी के नेतृत्व में  आंदोलन जारी था।
जतिन बाघा की जर्मनी से हथियार मंगवाने की योजना का अंग्रेजों को पता चल चुका था कर पुलिस क्रांतिकारियों को पकड़ने में पूरा जोर लगा रही थी।
क्रांतिकारी भूमिगत हो गए थे। 

चंदननगर में  सितंबर 1915 में ननिबाला ने  एक मकान किराये पर लिया जिसमे क्रांतिकारी जादूगोपाल मुखर्जी, अमर चटर्जी, अतुल घोष, भोलानाथ चटर्जी, विजय चक्रवर्ती, विनय भूषण दत्त को आश्रय दिया। इन सभी के क्रांतिकारियों को पकड़ाने वाले को  हजार-हजार रुपये के ईनाम  घोषित थे। 

पुलिस को पता चल गया था कि ननिबाला ही  रामचंद्र की पत्नी बन कर जेल में मिलने गई थी ।
ननिबाला के पिता सूर्यकांत को पुलिस रोज पकड़ कर ले जाती और सारा दिन पूछताछ करती थी।
ननिबाला पुलिस से बच कर पेशावर जा रही थीं पर हेजे की शिकार हो गयीं और पुलिस ने ननि बाला को  काशी जेल ले डाल दिया।

जेल में ननिबाला पुलिस की  अमानवीय व असहनीय यातनाओं की शिकार हुई।
पुलिस ने ननिबाला को निर्वस्त्र कर उनके गुप्तांग में लालमीर्च का पाउडर डाल कर असहनीय दुःख दिया पर ननि बाला ने क्रांतिकारियों के बारे में कोई सूचना नहीं दी।

जेल में  ननिबाला ने भूख हड़ताल के समय गुप्तचर विभाग के अधीक्षक गोल्डी को अपनी मांग का पत्र दिया जिसे गोल्डी फाड़ दिया इस पर ननिबाला ने गोल्डी के मुंह पर घुसा मार दिया था ।

आम माफ़ी के समय ननि बाला जेल से रिहा की गई।  समाज में ननिबाला को कोई सहारा नहीं मिला।
बीमार होने पर ननि बाला को एक साधु ने सेवा की । तत्पश्चात ननि बाला ने गेरुआ धारण कर लिया।
गुमनामी में ननि बाला देवी का 1967 में देहांत हुआ।
शत शत नमन वीरांगना को।

अंबिका चक्रवर्ती

अंबिका प्रसाद चक्रवर्ती चटगांव सशस्त्र क्रांति के योद्धा थे। मास्टर “दा” भारत के महान क्रान्तिकारी सूर्य सेन के नेतृत्व में 18 अप्रैल 1930 को भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा चटगांव (अब बांग्लादेश में) में पुलिस और सहायक बलों के शस्त्रागार पर कब्जा किया गया था।

विस्तृत रूप में हमारी वैब पर “सुपर एक्शन चटगांव ” पढ़े।

इस योजना में टेलीफोन और टेलीग्राफ तारों को काटने और ट्रेन की गतिविधियों को बाधित करने वाले दल में अंबिका चक्रवर्ती ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ।

22 अप्रैल 1930 की दोपहर को चटगांव छावनी के पास जलालाबाद पहाड़ियों में क्रांतिकारियों को कई हज़ार सैनिकों ने घेर लिया।

इस लड़ाई में अंबिका भी घायल हुए थे पर पलायन में सफल हो गए।

इस घटना के प्रतिरोध पर क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिये एक तीव्र छापेमारी शुरू हुई।

चट गांव एक्शन में अंबिका को 1930 में फांसी की सजा सुनाई गई पर बाद इसे आजीवन कारावास में बदल कर अंबिका को अंडमान जेल में भेज दिया गया।

जेल में उनका झुकाव साम्यवाद की तरफ हो गया । जेल से रिहा होने के बाद अंबिका कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने।

कम्युनिस्ट आंदोलन में अंबिका 1949 से 1951तक जेल में रहे।

1952 में पश्चिमी बंगाल विधानसभा से निर्वाचित हुए।

अंबिका का जन्म जनवरी 1892 में बर्मा में हुआ था।

6 मार्च 1962 को एक सड़क दुर्घटना में अंबिका का देहांत हुआ।

शत शत शत

    :-चारु चंद्र बोस-:

  

आज के दिन चारु चंद्र बॉस को दिनांक 19 मार्च 1999 को केंद्रीय कारागार अलीपुर में फांसी दी गई थी।



चारु चंद्र बोस बंगाल के क्रांतिकारी थे  जो शारिरिक रूप से बहुत कमजोर  दिखाई देते थे।
उनके दाहिने हाथ कीअंगुलिया नहीं थी।

आपने दाहिने हाथ के पिस्तौल बांधकर बांये की अंगुली से घोड़ा दबाकर पिस्तौल चलाने का अभ्यास किया।

सशस्त्र क्रांति के क्रम में बंगाल अनुशीलन समिति के क्रांतिकारी प्रफुल्ल चाकी व खुदीराम बोस द्वारा मुजफ्फरपुर में कसाई काजी किंग्फोर्ड की गाड़ी पर बम फेंका था।

इसके बाद पुलिस ने छापे मारे और बारीन्द्र दल के  38 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया गया ।

जिसे इतिहास में अलीपुर षड्यंत्र कहा जाता है ।
हम उसे अलीपुर एक्शन कहेंगे।
  
अलीपुर मामले में की अदालत सुनवाई में  सरकार की तरफ से आशुतोष विश्वास पैरवी करते थे।

आशुतोष ने क्रांतिकारियों को सजा दिलाने के उद्देश्य से झूठे गवाह बनाकर पेश किए।

जिसके कारण वह क्रांतिकारियों के टारगेट पर था ।

दिनाँक  10 फरवरी 1909 को  आशुतोष  विश्वास अलीपुर अदालत से निकलने वाले थे।

क्रांतिवीर चारु चंद्र ने आशुतोष को गोलियों से उड़ा दिया
चारु मौका पर ही गिरफ्तार कर लिए गए थे।

चारुपर मुकदमा चला फाँसी की सजा सुनाई गई 
चारु को दिनांक 19 मार्च 1999 को केंद्रीय कारागार अलीपुर में फांसी दे दी गई।

शत शत शत नमन

विजय सिंह पथिक

      

विजय सिंह पथिक

आपका वास्तविक नाम भूप सिंह था। आपका जन्म  27 फरवरी 1882 को बुलन्दशहर जिले के ग्राम गुठावली कलाँ के एक अहीर परिवार में हुआ था।

सन 1907 में इंदौर में युवावस्था में ही आपका सम्पर्क  विख्यात क्रांतिकारी शचीन्द्र नाथ सान्याल से हुआ से व फिर राशबिहारी बॉस ढाका अनुशीलन समिति के वरिंदर के युगांतर से दल से अब जुड़ गए क्रान्तिकारियों से हो गया था।

दिनाँक 2 मई 1908  को अलीपुर एक्शन के मामले में मानिकतला बाग में युगान्तर दल की बम्ब बनाने की फैक्टरी में आपको भी  गिरफ्तार किया गया था परंतु अब कोई सबूत नहीं होने के कारण आपको छोड़ दिया गया।

दिल्ली में लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंकने के  एक्शन में प्रतापसिंह बारहट के साथ आप भी शामिल थे।

रासबिहारी बोस की योजना के अनुसार आपने राजपूताना के राज परिवारों से संपर्क किया और उन्हें आजादी की लड़ाई हेतु तैयार किया।

आपके राजपूताना के क्रांतिकारी अर्जुन लाल सेठी , खरवा के राव गोपाल सिंह, ब्यावर के सेठ दामोदर दास, प्रतापसिंह जी  बारहठ आदि से अच्छे संबंध थे।

आप लोगों ने वीर भारत माता का सभा” का गठन किया था।

आपके श्यामजी कृष्ण वर्मा क्रांतिकारी अरविंद घोष  से भी अच्छे संबंध थे।

उस दिनों  4 कारतूस एक साथ चलाने वाली बंदूकों  के  कारतूस नहीं मिलने के कारण आपने ऐसी  बंदूकें सस्ते भाव में खरीदी और इनकी गोलियां कारतूस बनाने के प्रशिक्षण हेतु रेलवे में नौकरी  भी की।

रासबिहारी बोस के नेतृत्व में समस्त भारत के क्रांतिकारियों व विदेशों से आए गदर पार्टी के सदस्यों ने 21 फरवरी 1915 को समस्त भारत में अंग्रेजों पर एक साथ सशस्त्र हमला करने की योजना बनाई थी।

राजपूताना में इस योजना का दायित्व आप व राव गोपालसिंह जी पर था।

तय योजना के अंतर्गत 19 फरवरी 1915 को अजमेर से अहमदाबाद गाड़ी पर बम फेंका जाना था जो क्रांति का सिग्नल था।

सिग्नल मिलने  के पश्चात आपको नसीराबाद में अंग्रेजों पर  सशस्त्र  आक्रमण करना था ।

राजपूताना में खरवा के जंगलों में आप और आपके  हजारों  क्रांतिकारी साथी बम्ब व बंदूके धारण किये तैयार थे।

फरवरी 1915 की क्रांति के बारे में एक गद्दार कृपाल सिंह द्वारा पुलिस  समस्त सूचना ददी ।

अंग्रेजों ने छावनीयों में भारतीय सैनिकों से हथियार ले लिए गए व बहुत बड़ी संख्या मर गिरफ्तारीयां हो गई जिसके  कारण क्रांति सफल नहीं हुई।

क्रांति का सिग्नल नहीं मिलने के कारण आप आपके साथी इधर-उधर छिप गए।

  आपके साथ राव गोपाल सिंह, मोर सिंह व  सवाई सिंह आदि थे।

आप अपने  साथियों के साथ। “शिकारी  बुर्जी “ में आश्रय लिए हुए थे।

उसी समय  अजमेर कमिश्नर ने पुलिस के साथ  आप का घेराव कर लिया ।

आपने  बुर्जी के अंदर से मुकाबले हेतु  मोर्चे संभाल लिए ।

जिसके कारण कमिश्नर डर गया क्योंकि आपका उस क्षेत्र में अच्छा प्रभाव था और फायरिंग की स्थिति में जन आंदोलन होने की संभावना थी।

अंततः  सरकार से हुए समझौता के अनुसार  आप लोग डोरगढ़ के किले में नजर बंद  किया गया।

इस बीच आपके नाम से फिरोजपुर मामले में आपके गिफ्तारी वारण्ट जारी हो गए थे।

आपने एक डोरगढ़ के किले से साधु का भेष बनाकर फरार हो गए।

उस समय आपने अपना नाम। विजय सिंह पथिक रखा था।

इसके बाद आप यहां से एक दो रियासतों के राजाओं के पास आश्रय हेतु गए  परंतु उन्होंने आप को आश्रय देने  से मना कर दिया ।

वहाँ से निकलने के लिए  उनके वाहन  मांगे तो पहचाने जाने के डर से वाहन भी उपलब्ध कराने से मना कर दिया।

आप रात को एक जंगल में सोए हुए थे कि शेर ने अपने मुंह मे आप भी टांग पकड़ कर जंगल की ओर घसीटने लगा

आप की आंख खुली तो आपने बिना घबराहट के अपने पिस्तौल से शेर को गोली मार कर  मार दिया।

एक बूढ़ी औरत के यहां आश्रय लिया   क्रांतिकारीयों के फ़रार होने के बारे में खबरें फेल चुकी थी ।

उस औरत को एहसास हो गया की हो ना हो आप क्रांतिकारियों में से ही एक है ।

इसलिए उसने अपने बेटे को भेजकर एक घोड़ी की व्यवस्था की और आपको वहां से फरार होने का मौका दिया ।

इसके बाद आप गुरला ठाकुर के पास रुके फिर ईश्वरदान जी चारण  (प्रताप सिंह बारहठ के बहनोई) के पास उनके गांव में घ गए उस समय ईश्वरदान जी घर पर नहीं थे।

बिजौलिया से आये एक साधु सीताराम दास आपसे बहुत  प्रभावित थे ।

  उसने आपको बिजोलिया किसान आन्दोलन का नेतृत्व सम्भालने को आमंत्रित किया।

बिजोलिया में  किसानों से 84  मालगुजारी(लागें) वसूली जाती थी । जिनके किसानों की दशा आर्थिक रूप से बहुत खराब हो गई थी ।

आपने 1916 में बिजौलिया  जाकर किसान आन्दोलन की कमान अपने हाथों में  ली।

आपने किसानों के 13 सदस्यों का एक पंच मंडल बनाया। प्रत्येक गाँव में किसान पंचायत की शाखाएँ खोली। क्षेत्र के समस्त किसानों को एकत्रित किया।

आपके आंदोलन में महिलाओं ने भी भाग लिया। सरकारी सेना ने गोलियां चलाई जिसमें सुपाजी व कर्माजी   नामक किसान शहीद हुए ।


किसान आंदोलन अलवर
मेवाड़ ,बूंदी ,सिरोही में शुरू होक  में
सीकर   तारवाटी , उदयपुरवाटी में हरलाल सिंह के नेतृत्व में जमींदारों के खिलाफ किसान आंदोलन शुरू हुआ।

राजस्थान में  करीब 2000 किसान शहीद हुए ।
बिजोलिया आंदोलन के समाचार को खूब प्रचारित किया था।

गणेश शंकर विद्यार्थी ने कानपुर से प्रकाशित अपने समाचार पत्र। ” प्रताप” व बाल गंगाधर तिलक ने अपने समाचार पत्र  मराठा में आंदोलन का प्रचार किया।
 आपके प्रयत्नो से बाल गंगाधर तिलक ने  अमृतसर  1919 में कांग्रेस की बैठक में  बिजौलिया आंदोलन सम्बन्धी प्रस्ताव रखा गया।


आपने बिजोलिया किसानों के सम्बंध में बम्बई जाकर  गांधी जी से भी चर्चा की।

गांधी जी नेविश्वास दिलाया कि  मेवाड़ सरकार द्वारा किसानों को राहत नहीं दी जाती है तो गांधी जी स्वयं ने  बिजौलिया आकर सत्याग्रह  करेगें।

आपके  प्रयत्नों से 1920 में अजमेर में राजस्थान सेवा संघ की स्थापना हुई।

इस संस्था की शाखाएँ पूरे प्रदेश में खुल गईं।

इस संस्था ने राजस्थान में कई जन आन्दोलनों का संचालन किया।

सन 1920 में आप अपने साथियों के साथ नागपुर अधिवेशन में शामिल हुए और बिजौलिया के किसानों की दुर्दशा और देशी राजाओं की निरंकुशता को दिखाती हुई एक प्रदर्शनी का आयोजन किया।

  गांधी जी ने अहमदाबाद अधिवेशन में बिजौलिया के किसानों को हिजरत करने यानी क्षेत्र छोड़ चले जाने की सलाह दी।

जिस आपने विरोध करते हुए कठोर शब्दों में  कहा 
यह तो केवल हिजड़ों के लिए ही उचित है , मर्दों के लिए नहीं।

सन् 1921 के आते-आते पथिक जी ने राजस्थान सेवा संघ के माध्यम से बेगू, पारसोली, भिन्डर, बासी और उदयपुर में शक्तिशाली आन्दोलन किए।

बिजौलिया आन्दोलन अन्य क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गया था।

राजस्थान में किसान आन्दोलन की लहर चल पड़ी है।

इस बीच में बेगू में आन्दोलन तीव्र हो गया।

मेवाड सरकार ने बेगू आंदोलन में आपको 10 सितम्बर 1923 को  गिरफ्तार कर लिया और उन्हें पाँच वर्ष की सजा सुना दी गई।

कैद के बाद आप अप्रैल 1927 में रिहा हुए।

अंतत: सरकार ने राजस्थान के ए० जी० जी० हालैण्ड को बिजौलिया किसान पंचायत बोर्ड और राजस्थान सेवा संघ से बातचीत करने के लिए नियुक्त किया।

शीघ्र ही दोनो पक्षों में समझौता हो गया।
किसानों की अनेक माँगें मान ली गईं।
चैरासी में से पैंतीस लागतें माफ कर दी गईँ।

दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही की गई ।

आपका 28 मई 1954  को स्वर्गवास हुआ।

  
आपने प्रारंभिक विद्यालयी शिक्षा ग्रहण की थी । पर अभ्यास से आपने हिंदी, उर्दू, इंग्लिश व मराठी भाषा का ज्ञान प्राप्त किया।

आप क्रांतिकारी होने के साथ साथ कवि, लेखक और पत्रकार भी थे। 
आपने अजमेर से ” नवसंदेश “
और “राजस्थान संदेश ‘ के नाम से व वर्धा से। ‘राजस्थान केसरी’ हिन्दी के अखबार भी निकाले। 
अजमेर से ही पथिक जी ने  नया पत्र नवीन राजस्थान प्रकाशित किया।

आप “तरुण राजस्थान ” नाम के एक हिन्दी साप्ताहिक में
“राष्ट्रीय पथिक” के नाम से अपने विचार भी व्यक्त किया करते थे।

आपने अजय मेरु (उपन्यास)लिखा

उनके काम को देखकर ही उन्हें राजपूताना व मध्य भारत की प्रांतीय कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।

भारत सरकार ने विजय सिंह पथिक की स्मृति में डाक टिकट भी जारी किया।

आपकी कविता,

“यश वैभव सुख की चाह नहीं, परवाह नहीं जीवन न रहे;
यदि इच्छा है तो यह है-जग में स्वेच्छाचार दमन न रहे।”

, लोकप्रिय हुई।
 

पूरे राजस्थान में वे राष्ट्रीय पथिक के नाम से अधिक लोकप्रिय हुए।

शत शत नमन

तांत्या भील उर्फ टण्ड्रा भील

आपका जन्म जिला निमाड़ के पास गांव बिरदा में सन 1842 में हुआ ।

 
उस समय अंग्रेज बड़े जमीदारों की मार्फ़त   किसानों  से जमीन का  लगान वसूल करते थे।

फसलें खराब होने के कारण आपके द्वारा अपनी पोखर की पैतृक जमीन का लगान जमा नहीं करायाया         जा सका

जिसके कारण शिवा पटेल नामक मालगुजार जमींदार ने आपको अपनी  पैतृक जायदाद से बेदखल कर दिया।

टण्ड्रा को  कहीं न्याय नहीं मिला जिसके कारण  टण्ड्रा के मन मे अंग्रेजी शासन व जमीदारों मालगुजारों के प्रति घृणा पैदा हो गई।

गांव पोकर वासियों  ने षड्यंत्र करके  तत्कालीन कानून के अंतर्गत टण्ड्रा को पर बदमाशी करने का  मुकदमा करवा कर  एक साल की सजा करवा दी।

जेल से निकलने के बाद टण्ड्रा  अपने गांव  पोखर  गया पर वहां के लोग  टण्ड्रा के खिलाफ थे।

इसलिए  हीरापुर गांव में बस गया वहाँ  7 वर्ष तक मजदूरी करके अपना जीवन व्यतीत किया ।

लेकिन पोकर गांव वालों ने  टण्ड्रा को चोरी के झूठे मुकदमा में फसा दिया।
चोरी के अपराध का कोई सबूत नहीं मिला इसलिए टण्ड्रा को छोड़ दिया गया।

टण्ड्रा ने गिफ्तारी के समय  पुलिस के साथ  हाथापाई की थी । उसके लिए टण्ड्रा को  तीन माह की सजा दी गई ।

इस सजा के बाद  वापस आकर टण्ड्रा ने इंदौर रियासत में आश्रय लिया ।

पोकर वासियों ने टण्ड्रा को  सुभान नामक भील के घर चोरी के झूठे मुकदमा में  फसा दिया ।
पुलिस गिफ्तारी के डर से टण्ड्रा गांव छोड़कर भाग गया।

टण्ड्रा ने अपनी जाति के कुछ भीलों को लेकर अपना एक दल बनाया ।
टण्ड्रा ने  निमाड़  जिले के खजूरी गांव के बिजनिया नामक एक दिलेर  व शक्तिशाली भील डाकू से मुलाकात कर  उसे भी अपनी टोली में मिला लिया।
टण्ड्रा के दल के लोगों के परिवार पहाड़ी जंगलों में बस गए।

सरदार पटेल नामक व्यक्ति ने टण्ड्रा व  उसके साथी विजेनिया व दोपिया को गिरफ्तार करा कर
चोरी का झूठा मुकदमा  बनवाया व झूठे गवाह पेश कर सजा करवादी।

सजा के दिन टण्ड्रा ने भरी अदालत में हिमन पटेल नामक राजपूत्र को धमकी देते हुए कहा –

पटील दाजी म्हारो  नांव। टण्ड्रा छे  मख  पहीचाणी ल्यों ।  आज तो धोखासी मख फंसाई दीयो पण याद राखजो म्हारो नाम टण्ड्रा छे ।’ 

जेल में अन्य साथियों से मिलकर टुड्रा 15 फुट ऊंची दीवार फांद कर अपने साथियों सहित फरार हो गया।

टण्ड्रा  जेल से फ़रार होने के बाद अपना संगठन तैयार किया ।
अपने दुश्मन मालगुजारों उनके झूठे गवाहों के घर जला दिए।

टण्ड्रा ने दुश्मनों की महिलाओं की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखा ।

टण्ड्रा ने 1878 से 1886  तक लगभग 400 डाके  डाले।

टण्ड्रा बड़े जमींदारों व जनता का खून चूसने वालों के यहां डाके डालता था ।

टण्ड्रा डाको  से प्राप्त धन को गांव के गरीब लोगों में बांट देता था। गांव के लोग टण्ड्रा को  मामा कहते थे।

गणपत नामक एक व्यक्ति ने टण्ड्रा को माफी दिलाने का विश्वास दिला कर मेजर ईश्वरी प्रसाद  के हाथों धोखे से गिरफ्तार करवा दिया।

टण्ड्रा पर हत्या व डकैती के मुकदमे चले।

  टण्ड्रा को जबलपुर डिप्टी कमिश्नर अदालत से 26 सितंबर 1889 /       19 अक्टूबर 1889 को फांसी की सजा सुनाई गई ।
अक्टूबर-नवंबर 1888 में    या                4 दिशम्बर 1889 टण्ड्रा को फांसी दे दी गई।

तिथियों पर विवाद है

टण्ड्रा को भील लोग देवता मानते थे  उनका विश्वास था टुण्ड्रा को त ईश्वरीय शक्ति प्राप्त है।

टण्ड्रा को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद द न्यूयॉर्क टाइम्स अंतरराष्ट्रीय अंग्रेजी समाचार पत्र ने दिनांक 10 नवंबर 1889  को टण्ड्रा के सम्बंधित समाचार में  टण्ड्रा को             इंडियन रोबिन हुड बताया ।
इतिहास में टण्ड्रा को
इंडियन रोबिन हुड
कहा जाता है।

टण्ड्रा  के नामसे पुलिस भयभीत रहती थी।
टुड्रा को पता चला कि उसे  गिरफ्तार करने हेतु एक विशेष पुलिस अधिकारी  आ रहा है।
टण्ड्रा स्टेशन पर कुली बन कर चला गया और उसने पुलिस अधिकारी का सामान लेकर उसके साथ थाने चला गया।
  पुलिस अधिकारी से बातचीत में कुली से टण्ड्रा के बारे बातचीत की तो कुली ने टण्ड्रा के छिपने की जगह का ज्ञान होना बताया व पुलिस अधिकारी को जंगल मे ले गया ।

पुलिस अधिकारी गुप्त रूप से टण्ड्रा को गिरफ्तार करने  के इरादे से कुली के साथ चला गया।

गहरे जंगल मे ले जाकर कुली ने कहा    कहा मैं टण्ड्रा हूँ  पकड़ो

पुलिस अधिकारी घबरा गया ।  टण्ड्रा जंगल में लापता हो गया।

एक बार टण्ड्रा  हजाम बनकर  पुलिस अधिकारी के घर हज़ामत करने चला गया।

टण्ड्रा के बारे में बातचीत होने लगी तो हजाम ने   बातों में पूछा           महाराज आप  में इतनी हिम्मत है कि टुण्ड्रा को पकड़ लेंगे ?
अगर है तो पकड़ो ,
मैं ही टण्ड्रा हूँ ।

और फुर्ती से पुलिस अधिकारी का नाक काट कर भाग गए।