"गणेश शंकर विद्यार्थी"
विद्यार्थी जी वो कांग्रेसी नेता थे जो देश में चल रहे क्रांतिकारी आंदोलन के साथ साथ भी जुड़े थे।
उनके लेख, प्रेस की आज़ादी, दास प्रथा, क्रांतिकारी आंदोलन के उभार और यहाँ तक कि सशस्त्र संघर्ष के समर्थन में भी अपनी बात कहते थे।
गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म 26, अक्टूबर 1890 को इलाहाबाद में हुआ था। हाइ स्कूल की परीक्षा के वे पत्रकारिता से जुड़े। प्रदीप, स्वराज्य, कर्मयोगी और अभ्युदय आदि पत्रिकाओं में उनके क्रांतिकारी लेख नियमित रूप से प्रकाशित होते थे।
गणेश शंकर विद्यार्थी 1913 से समाचार पत्र “प्रताप” का संपादन करते थे। भगत सिंह द्वारा अपने छदम नाम ” बलवंत सिंह” के नाम से लिखे गए लेख “प्रताप ” में ही प्रकाशित होते थे।
भगत सिंह 1924 में अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़कर कानपुर में विद्यार्थी जी से मिले थे । विद्यार्थी जी ने ही भगत सिंह के रहने की व्यवस्था मुन्नीलाल जी अवस्थी के घर में की थी।
वे क्रांतिकारियों की हर तरह से सहायता करते थे। उनका घर और कार्यालय , क्रांतिकारियों के गोपनीय गतिविधियों का केंद्र भी हुआ करता था।
उनके अनेक क्रांतिकारी किस्से है। पर सबसे रोचक व हृदय स्पर्शी किस्सा पढ़िए।
शहीद अशफाक उल्ला ख़ां ने फांसी से पहले दिन अपने भाई साहब को एक तार संदेश प्रेषित करने हेतु दिया जो गणेश शंकर विद्यार्थी को उनके पते पर भेजना था।
तार भेज दिया गया । तार में अशफ़ाक में
लिखा था 19 दिसंबर को दिन 2:00 बजे लखनऊ स्टेशन पर मुलाकात करें। उम्मीद है ,आप मेरी इल्तिजा कुबूल फरमाएंगे।
यह घटना बहुत ही मार्मिक है गणेश शंकर विद्यार्थी को पता चल चुका था कि 19 दिशम्बर को अशफाक को फांसी दी जानी है।
इसलिए वे समाचार पत्र का संपादकीय लेख अशफ़ाक पर ही लिख रहे थे । इस बीच वह तार प्राप्त हुआ उन्होंने तार को मेज पर रख दिया और अपने काम में लग गए ।
इत्तफाक से हवा का झोंका आया और तार उड़कर गणेश शंकर विद्यार्थी के हाथ की कलम के आगे आ गया ।
विद्यार्थी जी ने तार खोल कर पढ़ा तो सब समझ में आ गया और विद्यार्थी जी साथियों सहित फूलमालाएँ लेकर स्टेशन पर अशफाक के स्वागत में गए । उस ट्रेन से अशफाक उल्ला जी का पार्थिव शरीर लाया गया था।
विद्यार्थी जी 25 मार्च 1931 को कानपुर में हुए हिंदू मुस्लिम दंगो को शांत करने की कोशिश पर कर रहे तब विद्यार्थी जी की हत्या कर दी गई ।
