:- चंद्र शेखर ‘आज़ाद’ -:

स्वतंत्रता संग्राम के अजेय योद्धा चन्द्रशेखर का जन्म गांव भाँवरा तहसील झाबुआ तत्कालीन अलीपुर रियासत में दिनांक जुलाई 1906 कोहुआथा।
चंद्र शेखर के पिता पंडित सीताराम तिवारी आर्थिक रूप से कमजोर थे। आज़ाद का जन्म एक झोम्पड़ी में हुआ थ।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय बाराणसी में 13 से 15 वर्ष की आयु के बच्चों के एक जुलूस को पुलिस ने तितर -बितर कर उनके नेता को पकड़ कर मजिस्ट्रेट के पास पेश किया गया बाल नेता की आयु भी लगभग 12 वर्ष थी।
मजिस्ट्रेट ने बालक से उसका नाम पूछा तो बताया “आजाद”।
दूसरा प्रश्न में पिता का पूछा नाम तो बालक ने बताया “स्वाधीनता’
मजिस्ट्रेट तीसरे प्रश्न में मजिस्ट्रेट ने निवास स्थान पूछा तो बालक ने कहा “जेलखाना “।
इस तरह के उत्तर सुनकर मजिस्ट्रेट ने बालक को 15 बेंते लगाने की सजा दी।
बालक को बांधकर बेंते लगाई गई। बेंत पड़ने के साथ ही बच्चे ने निडर होकर नारे लगाए , “महात्मा गांधी जी की जय”। बालक बेहोश हो गया।
सजा के बाद बालक का शहर में अभिनंदन हुआ । कद छोटा था इसलिए भीड़ को दिखाने के लिए मेज पर खड़ा किया गया ।
इस घटना से बच्चे ने अपनी पहचान खुद बनाई थी जिसे हम “आज़ाद ” से जानते है। आज़ाद नाम सुनते ही फ़िरंगियों व पुलिस की घिग्घी बंध जाती थी।
गांधीजी द्वरा असहयोग आंदोलन वापस लिए जाने के बाद वही वीर बालक जो बेंते खाते समय महात्मा गांधी की जय बोल रहा था ।गांधी आंदोलन से हटकर क्रांतिपथ की ओर चला।
उन दिनों सुरेश भट्टाचार्य बनारस में “कल्याण आश्रम ‘ के नाम से एक क्रांतिकारी संस्था चला रहे थे। शचींद्र सान्याल उतरी भारत आये हुए थे । इस समिति का विलय कर” हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन” क्रांतिकारी दल का गठन हुआ। इसका बनारस में नेतृत्व शचिंद्र नाथ बक्शी तथा राजेंद्र लाहिड़ी ने किया ।
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में दल का नेतृत्व पंडित राम प्रसाद बिस्मिल कर रहे थे ।
दल में अशफाक उल्ला खान , मन्मथ नाथ गुप्त, ठाकुर रोशन सिंह, रामकृष्ण खत्री, दामोदर सेठ ,भूपेंद्र सान्याल आदि लोग भी शामिल थे। दल का उद्देश्य सशस्त्र क्रान्ति से अंग्रेजों को भारत से निकालना था।
इसी दल द्वारा 9 अगस्त 1925 को सफलता पूर्वक फ़िरंगियों का खजाना लूटा गया। इस घटना को काकोरी एक्शन के नाम से जानिए।काकोरी एक्शन में सबसे कम आयु के क्रांतिकारी आज़ाद जी थे।जो कभी गिरफ्तार नहीं हुए।
इसी दल द्वारा 31 दिसंबर 1926 को वायसराय इरविन की गाड़ी को बम्ब से उड़ाया था। पर दुर्भाग्य से इरविन बच गया ।
फ़रारी के समय आज़ाद जी झांसी के ओरछा के जंगलो में हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से गुप्त रूप से संगठन को तैयार करते रहे।
और 8 सितंबर 1929 को दिल्ली के फिरोज शाह कोटला मैदान में क्रांतिकारियों की एक गुप्त सभा हुई व हिदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन में भगत सिंह ने ‘सोशलिस्ट ‘ शब्द और जोड़ा गया ।इसकी प्रचार शाखा का काम भगतसिंह व आर्मी शाखा का काम कमांडर- इन- चीफ़आज़ाद जी संभालते थे।
साइमन कमीशन 20 अक्टूबर 1928 को लाहौर आया जिसका काले झंडे दिखाकर विरोध किया गया। इस प्रदर्शन में इस दल के लोग साथ थे। पुलिस ने लाठीचार्ज किया लाला लाजपतराय को गंभीर चोटे आई जिससे लाला जी का दिनाँक17 नवम्बर 1928 को देहान्त हो गया।
पंजाब के ही नहीं पूरे देश के क्रांतिकारियों ने लाला जी की मृत्यु को राष्ट्रीय अपमान माना और इस अपमान का बदला आज़ाद जी के नेतृत्व में भगतसिंह, राजगुरु ने दिनांक 17 दिसंबर 1928 को सांडर्स का वध करके लिया था।
इसी दल की तरफ से शहीदेआजम भगतसिंह की योजना के अनुसार 8 अप्रैल 1929 को असेंबली में नकली बम डालकर अंग्रेजी कुशासन की बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाई गई थी।
इसके बाद भगत सिंह राजगुरु, सुखदेव की गिरफ्तारी हो गयी कुछ लोग सरकारी गवाह बन गए।

संगठन बिखर गया । गांधीजी व कांग्रेस ने आज़ाद जी की कोई सहायता नहीं की।
आज़ाद जी ने गदरपार्टी के पुराने क्रांतिकारी पृथ्वी सिंह जी से सम्पर्क किया जिहोंने भगतसिंह व साथियों को जेल से बाहर निकालने की जुम्मेवारी ली।
इसी योजना के संबंध में दिनाँक 27 फरवरी 1931 को आज़ाद जी अल्फ्रेड पार्क में थे ।
किसी देशद्रोही ने पुलिस को ख़बर कर दी ऐतिहासिक मुठभेड़ हुई और आज़ाद जी ने अपने ही माउजर की आखिरी गोली से आत्म बलिदान किया।
आजाद जी हमेशा कहते थे
” दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे,
आजादी ही रहे हैं आज़ाद ही रहेंगे ।”
और अपने माउजर पर हाथ रखकर कहते थे
“जब तक यह बम- तूरू- बुखारा मेरे पास है, तब तक कोई माई का लाल मुझे पकड़ नहीं सकता। मैं आजाद हूं। आजाद ही रहूंगा ।
आज़ाद जी के जीवन के कुछ किस्से इस प्रकार है।
आज़ाद जी महिलाओं का बहुत सम्मान करते । एक बार डाका एक्शन में एक तकड़ी महिला ने चंद्रशेखर आजाद का हाथ पकड़ लिया भैयाजी ने हाथ छुड़ाने के लिए महिला पर जोर नहीं आजमा रहे थे इतने में बिस्मिल आये व छुड़ा कर ले गए।

एक बार रामकृष्ण खत्री ने धन प्राप्त की योजना बनाकर आज़ाद जी को गाजीपुर में एक उदासियां महंत का शिष्य बना दिया। योजना थी कि महंत वृद्ध है मरते ही डेरा अपना। आजाद जी ने कुछ दिन बाद वहाँ रहने से मना कर दिया। मन्मथ नाथ गुप्त व खत्री जी मिलने गए तो आज़ाद जी व्यथा सुनाते हुए कहा । यह साला महंत अभी मरने वाला नहीं है ,खूब दूध पीता है । यह दोनों शीघ्र बुलाने का आश्वासन देकर आ गए एक-दो दिन तो आज़ाद जी इंतजार किया फिर मौका देख कर बिना सूचना के ही मठ छोड़ कर निकल आए ।
एक असहयोग आंदोलन के समय लड़कियों ने चूड़ी आंदोलन शुरू कर रखा था । लड़कियां चूड़ियां लेकर सड़कों पर घूमती थी और जो भी युवापुरूष दिखाई देता उसे चूड़ियां पहना कर कहती है आजादी की लड़ाई लड़ नहीं सकते तो चूड़िया पहन कर बैठ जाओ।
बहनों का एक दिन आजाद जी से सामना हो गया उन्होंने पकड़ा हाथ और चूड़ियां डालने लगी कई ।वो आज़ाद का हाथ था चूड़ियां छोटी थी । आज़ाद जी कहा बहन ऐसी चूड़ी नही बनी जी मेरे हाथ में पहनाई जा सके।
आजाद जी का मूंछो पर ताव लगाते हुए जो फ़ोटो हम देखते है ।यह फ़ोटो मास्टर रूद्र नारायण सिंह जो चित्रकार व फोटोग्राफर भी थे ने लिया था। मास्टर जी ने आज़ाद जी कहा मुझे तुम्हारा फ़ोटो खिंचने दो । आज़ाद जी ने कहा मूंछो पर ताव लगाने दो ।इधर से आजाद जी ने मूंछो पर ताव लगाने हेतु हाथ लगाया कि मास्टर जी ने कैमरा क्लिक कर दिया । आज यह फ़ोटो राष्ट्र की थाती है।

एक घटना जिसे सुनकर आंखे भर आती है यह जानकर आज़ाद जी क्या थे !
हुआ यह कि एकबार गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने आज़ाद जी को 200 रुपये माता जी को घर भेजने हेतु दिये । दल में खाने के लिये रुपये नहीं थे इसलिये आजाद जी ने वो राशि दल के लिए खर्च करदी ।
जब पूछा गया कि माँ को रुपये क्यों नहीं भेजे तो आज़ाद जी उतर सुनकर आप सोच सकेंगें की ऐसा महान क्रांतिकारी शायद ही कोई दूसरा हुआ हो ।
आज़ाद जी ने कहा उस बूढ़ी के लिए पिस्तौल की दो गोलीयां काफी है। विद्यार्थी जी , इस गुलाम देश में लाखों परिवार ऐसे है जिन्हें एक समय भी रोटी नसीब नहीं होती । मेरी माता दो दिन से एक बार तो भोजन पा ही जाती है, वे भूखी रह सकती है,पर पैसे के लिए पार्टी के सदस्यों को भूख नहीं मरने दूंगा।उनकी आवश्यकताओं को पूरा करना सर्वप्रथम कर्तव्य है। मेरे माता पिता भूखे मर भी गए तक उससे देश को कोई नुकसान नहीं होगा,एसे कितने ही इसमें मरते जीते हैं।””
शत शत नमन।•

20-20
गोरखा बिगुलर ने बिगुल फूँका। कमरबन्दी में मुस्तैद 40 जवानों ने 0 गोलियाँ बंडोलियर में रखीं और अपने-अपने .410 बोर मास्कट सँभाले । रिवाल्वर लोड किये और 18-18 स्पेयर राउण्ड्स पाउचों के हवाले किये। फिर शेष 40 ने लाठियाँ थामीं। टिटर्टन और हैरिस ने भी अपने-अपने वेब्ले-स्काट चार गाड़ियों में बैठकर सब एलफ्रेड पार्क की ओर रवाना हुए। •
प्रातः 9 बजे आनन्द भवन में जवाहरलाल नेहरू से भेंट करने के पश्चात् चन्द्रशेखर आज़ाद सुखदेवराज को साथ लिए एलफ्रेड पार्क पहुँचे थे। छिन्न-भिन्न हो रही पार्टी के सम्बन्ध में आवश्यक निर्णय लेने थे। दोनों एक बड़े से जामुन के पेड़ के नीचे इन गम्भीर मसलों पर विचार-विमर्श करने बैठ गये। विश्वविद्यालय से आने वाले एक ‘कोरियर’ का भी इन्तज़ार था। शायद, कोई ज़रूरी पत्र या समाचार ला रहा हो। उसे ठीक साढ़े नौ बजे यहीं पार्क में मिलने का आदेश था।
यशपाल से इशारा मिलने पर वीरभद्र तिवारी ने दोनों को एलफ्रेड पार्क में एक जामुन के पेड़ के नीचे बैठे देखा था।
वह तुरन्त शम्भूनाथ के पास पहुँचा और छूटते ही बोला, “पंडित जी एलफ्रेड पार्क में हैं। जल्दी कीजिये ।एस. पी., एस. बी. जॉन नॉटबावर तुरन्त अपनी कार से एलफ्रेड पार्क पहुँचा। हथियारों से लैस पुलिस ने पार्क को तीन तरफ से घेर लिया। पुलिस कप्तान मैज़र्स के साथ डिप्टी कमिश्नर बमफोर्ड पार्क के बाहर ही रहे।
मौसम सर्द था । हवा भी तेज़ थी । चन्द्रशेखकर आज़ाद खद्दर की धोती, कमीज़ और ठंडी सदरी पहने (उनके पास गरम कपड़े थे ही नहीं) सुखदेवराज के साथ संजीदगी से बातें कर रहे थे। अचानक नॉटबावर वहाँ पहुँचा और कार से उतरते-उतरते आज़ाद को देखते ही गोली दाग दी। गोली निशाने पर लगी और उनकी दाहिनी जाँघ को चीरती हुई हड्डी तोड़कर निकल गयी। (.455 बोर की गोली थी, जिससे अच्छे-अच्छे जानवर भी क्षण-भर में बिलट जाते हैं। आदमी की तो बिसात ही क्या !)
आज़ाद को पूरी स्थिति भाँपते देर न लगी। उन्होंने सुखदेवराज को शीघ्र की वहाँ से खिसक जाने का संकेत किया। (शायद, स्वयं भी घेरे से निकल भागने में कामयाब हो जाते, यदि नॉटबावर की पहली गोली से उनकी जाँघ की हड्डी
कुछ अधखुले पन्ने

”सहित 15 मिनट के अन्दर एलफ्रेड पार्क घेर लेने का आदेश मिला। गोली चलने
की पूरी-पूरी आशंका भी व्यक्त की गयी।
तुरन्त

पूरी तैयारी तो थी ही । मैज़र्स को फोन खटखटाया गया आर्ल्ड फोर्स के लिए।
31

:- चंद्र शेखर ‘आज़ाद’ -:

जन्म – 23 जुलाई 1906
शहादत- 27 फरवरी 1931
:- स्वतंत्रता संग्राम
के
अजेय योद्धा
चन्द्रशेखर का जन्म गांव भाँवरा तहसील झाबुआ तत्कालीन अलीपुर रियासत में हुआ था।
चंद्र शेखर के पिता पंडित सीताराम तिवारी आर्थिक रूप से कमजोर थे। आज़ाद का जन्म एक झोम्पड़ी में हुआ थ।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय बाराणसी में 13 से 15 वर्ष की आयु के बच्चों के एक जुलूस को पुलिस ने तितर -बितर कर उनके नेता को पकड़ कर मजिस्ट्रेट के पास पेश किया गया बाल नेता की आयु भी लगभग 12 वर्ष थी।
मजिस्ट्रेट ने बालक से उसका नाम पूछा तो बताया “आजाद”।
दूसरा प्रश्न में पिता का पूछा नाम तो बालक ने बताया “स्वाधीनता’
मजिस्ट्रेट तीसरे प्रश्न में मजिस्ट्रेट ने निवास स्थान पूछा तो बालक ने कहा “जेलखाना “।
इस तरह के उत्तर सुनकर मजिस्ट्रेट ने बालक को 15 बेंते लगाने की सजा दी।
बालक को बांधकर बेंते लगाई गई। बेंत पड़ने के साथ ही बच्चे ने निडर होकर नारे लगाए , “महात्मा गांधी जी की जय”। बालक बेहोश हो गया।
सजा के बाद बालक का शहर में अभिनंदन हुआ । कद छोटा था इसलिए भीड़ को दिखाने के लिए मेज पर खड़ा किया गया ।
इस घटना से बच्चे ने अपनी पहचान खुद बनाई थी जिसे हम “आज़ाद ” से जानते है। आज़ाद नाम सुनते ही फ़िरंगियों व पुलिस की घिग्घी बंध जाती थी।
गांधीजी द्वरा असहयोग आंदोलन वापस लिए जाने के बाद वही वीर बालक जो बेंते खाते समय महात्मा गांधी की जय बोल रहा था ।गांधी आंदोलन से हटकर क्रांतिपथ की ओर चला।
उन दिनों सुरेश भट्टाचार्य बनारस में “कल्याण आश्रम ‘ के नाम से एक क्रांतिकारी संस्था चला रहे थे। शचींद्र सान्याल उतरी भारत आये हुए थे । इस समिति का विलय कर” हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन” क्रांतिकारी दल का गठन हुआ। इसका बनारस में नेतृत्व शचिंद्र नाथ बक्शी तथा राजेंद्र लाहिड़ी ने किया ।
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में दल का नेतृत्व पंडित राम प्रसाद बिस्मिल कर रहे थे ।
दल में अशफाक उल्ला खान , मन्मथ नाथ गुप्त, ठाकुर रोशन सिंह, रामकृष्ण खत्री, दामोदर सेठ ,भूपेंद्र सान्याल आदि लोग भी शामिल थे। दल का उद्देश्य सशस्त्र क्रान्ति से अंग्रेजों को भारत से निकालना था।
इसी दल द्वारा 9 अगस्त 1925 को सफलता पूर्वक फ़िरंगियों का खजाना लूटा गया। इस घटना को काकोरी एक्शन के नाम से जानिए।काकोरी एक्शन में सबसे कम आयु के क्रांतिकारी आज़ाद जी थे।जो कभी गिरफ्तार नहीं हुए।
इसी दल द्वारा 31 दिसंबर 1926 को वायसराय इरविन की गाड़ी को बम्ब से उड़ाया था। पर दुर्भाग्य से इरविन बच गया ।
फ़रारी के समय आज़ाद जी झांसी के ओरछा के जंगलो में हरिशंकर ब्रह्मचारी के नाम से गुप्त रूप से संगठन को तैयार करते रहे।
और 8 सितंबर 1929 को दिल्ली के फिरोज शाह कोटला मैदान में क्रांतिकारियों की एक गुप्त सभा हुई व हिदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन में भगत सिंह ने ‘सोशलिस्ट ‘ शब्द और जोड़ा गया ।इसकी प्रचार शाखा का काम भगतसिंह व आर्मी शाखा का काम कमांडर- इन- चीफ़आज़ाद जी संभालते थे।
साइमन कमीशन 20 अक्टूबर 1928 को लाहौर आया जिसका काले झंडे दिखाकर विरोध किया गया। इस प्रदर्शन में इस दल के लोग साथ थे। पुलिस ने लाठीचार्ज किया लाला लाजपतराय को गंभीर चोटे आई जिससे लाला जी का दिनाँक17 नवम्बर 1928 को देहान्त हो गया।
पंजाब के ही नहीं पूरे देश के क्रांतिकारियों ने लाला जी की मृत्यु को राष्ट्रीय अपमान माना और इस अपमान का बदला आज़ाद जी के नेतृत्व में भगतसिंह, राजगुरु ने दिनांक 17 दिसंबर 1928 को सांडर्स का वध करके लिया था।
इसी दल की तरफ से शहीदेआजम भगतसिंह की योजना के अनुसार 8 अप्रैल 1929 को असेंबली में नकली बम डालकर अंग्रेजी कुशासन की बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाई गई थी।
इसके बाद भगत सिंह राजगुरु, सुखदेव की गिरफ्तारी हो गयी कुछ लोग सरकारी गवाह बन गए।

संगठन बिखर गया । गांधीजी व कांग्रेस ने आज़ाद जी की कोई सहायता नहीं की।
आज़ाद जी ने गदरपार्टी के पुराने क्रांतिकारी पृथ्वी सिंह जी से सम्पर्क किया जिहोंने भगतसिंह व साथियों को जेल से बाहर निकालने की जुम्मेवारी ली।
इसी योजना के संबंध में दिनाँक 27 फरवरी 1931 को आज़ाद जी अल्फ्रेड पार्क में थे ।
किसी देशद्रोही ने पुलिस को ख़बर कर दी ऐतिहासिक मुठभेड़ हुई और आज़ाद जी ने अपने ही माउजर की आखिरी गोली से आत्म बलिदान किया।
आजाद जी हमेशा कहते थे
” दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे,
आजादी ही रहे हैं आज़ाद ही रहेंगे ।”
और अपने माउजर पर हाथ रखकर कहते थे
“जब तक यह बम- तूरू- बुखारा मेरे पास है, तब तक कोई माई का लाल मुझे पकड़ नहीं सकता। मैं आजाद हूं। आजाद ही रहूंगा ।
आज़ाद जी के जीवन के कुछ किस्से इस प्रकार है।
आज़ाद जी महिलाओं का बहुत सम्मान करते । एक बार डाका एक्शन में एक तकड़ी महिला ने चंद्रशेखर आजाद का हाथ पकड़ लिया भैयाजी ने हाथ छुड़ाने के लिए महिला पर जोर नहीं आजमा रहे थे इतने में बिस्मिल आये व छुड़ा कर ले गए।

एक बार रामकृष्ण खत्री ने धन प्राप्त की योजना बनाकर आज़ाद जी को गाजीपुर में एक उदासियां महंत का शिष्य बना दिया। योजना थी कि महंत वृद्ध है मरते ही डेरा अपना। आजाद जी ने कुछ दिन बाद वहाँ रहने से मना कर दिया। मन्मथ नाथ गुप्त व खत्री जी मिलने गए तो आज़ाद जी व्यथा सुनाते हुए कहा । यह साला महंत अभी मरने वाला नहीं है ,खूब दूध पीता है । यह दोनों शीघ्र बुलाने का आश्वासन देकर आ गए एक-दो दिन तो आज़ाद जी इंतजार किया फिर मौका देख कर बिना सूचना के ही मठ छोड़ कर निकल आए ।
एक असहयोग आंदोलन के समय लड़कियों ने चूड़ी आंदोलन शुरू कर रखा था । लड़कियां चूड़ियां लेकर सड़कों पर घूमती थी और जो भी युवापुरूष दिखाई देता उसे चूड़ियां पहना कर कहती है आजादी की लड़ाई लड़ नहीं सकते तो चूड़िया पहन कर बैठ जाओ।
बहनों का एक दिन आजाद जी से सामना हो गया उन्होंने पकड़ा हाथ और चूड़ियां डालने लगी कई ।वो आज़ाद का हाथ था चूड़ियां छोटी थी । आज़ाद जी कहा बहन ऐसी चूड़ी नही बनी जी मेरे हाथ में पहनाई जा सके।
आजाद जी का मूंछो पर ताव लगाते हुए जो फ़ोटो हम देखते है ।यह फ़ोटो मास्टर रूद्र नारायण सिंह जो चित्रकार व फोटोग्राफर भी थे ने लिया था। मास्टर जी ने आज़ाद जी कहा मुझे तुम्हारा फ़ोटो खिंचने दो । आज़ाद जी ने कहा मूंछो पर ताव लगाने दो ।इधर से आजाद जी ने मूंछो पर ताव लगाने हेतु हाथ लगाया कि मास्टर जी ने कैमरा क्लिक कर दिया । आज यह फ़ोटो राष्ट्र की थाती है।

एक घटना जिसे सुनकर आंखे भर आती है यह जानकर आज़ाद जी क्या थे !
हुआ यह कि एकबार गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने आज़ाद जी को 200 रुपये माता जी को घर भेजने हेतु दिये । दल में खाने के लिये रुपये नहीं थे इसलिये आजाद जी ने वो राशि दल के लिए खर्च करदी ।
जब पूछा गया कि माँ को रुपये क्यों नहीं भेजे तो आज़ाद जी उतर सुनकर आप सोच सकेंगें की ऐसा महान क्रांतिकारी शायद ही कोई दूसरा हुआ हो ।
आज़ाद जी ने कहा उस बूढ़ी के लिए पिस्तौल की दो गोलीयां काफी है। विद्यार्थी जी , इस गुलाम देश में लाखों परिवार ऐसे है जिन्हें एक समय भी रोटी नसीब नहीं होती । मेरी माता दो दिन से एक बार तो भोजन पा ही जाती है, वे भूखी रह सकती है,पर पैसे के लिए पार्टी के सदस्यों को भूख नहीं मरने दूंगा।उनकी आवश्यकताओं को पूरा करना सर्वप्रथम कर्तव्य है। मेरे माता पिता भूखे मर भी गए तक उससे देश को कोई नुकसान नहीं होगा,एसे कितने ही इसमें मरते जीते हैं।””
शत शत नमन।•

20-20
गोरखा बिगुलर ने बिगुल फूँका। कमरबन्दी में मुस्तैद 40 जवानों ने 0 गोलियाँ बंडोलियर में रखीं और अपने-अपने .410 बोर मास्कट सँभाले । रिवाल्वर लोड किये और 18-18 स्पेयर राउण्ड्स पाउचों के हवाले किये। फिर शेष 40 ने लाठियाँ थामीं। टिटर्टन और हैरिस ने भी अपने-अपने वेब्ले-स्काट चार गाड़ियों में बैठकर सब एलफ्रेड पार्क की ओर रवाना हुए। •
प्रातः 9 बजे आनन्द भवन में जवाहरलाल नेहरू से भेंट करने के पश्चात् चन्द्रशेखर आज़ाद सुखदेवराज को साथ लिए एलफ्रेड पार्क पहुँचे थे। छिन्न-भिन्न हो रही पार्टी के सम्बन्ध में आवश्यक निर्णय लेने थे। दोनों एक बड़े से जामुन के पेड़ के नीचे इन गम्भीर मसलों पर विचार-विमर्श करने बैठ गये। विश्वविद्यालय से आने वाले एक ‘कोरियर’ का भी इन्तज़ार था। शायद, कोई ज़रूरी पत्र या समाचार ला रहा हो। उसे ठीक साढ़े नौ बजे यहीं पार्क में मिलने का आदेश था।
यशपाल से इशारा मिलने पर वीरभद्र तिवारी ने दोनों को एलफ्रेड पार्क में एक जामुन के पेड़ के नीचे बैठे देखा था।
वह तुरन्त शम्भूनाथ के पास पहुँचा और छूटते ही बोला, “पंडित जी एलफ्रेड पार्क में हैं। जल्दी कीजिये ।एस. पी., एस. बी. जॉन नॉटबावर तुरन्त अपनी कार से एलफ्रेड पार्क पहुँचा। हथियारों से लैस पुलिस ने पार्क को तीन तरफ से घेर लिया। पुलिस कप्तान मैज़र्स के साथ डिप्टी कमिश्नर बमफोर्ड पार्क के बाहर ही रहे।
मौसम सर्द था । हवा भी तेज़ थी । चन्द्रशेखकर आज़ाद खद्दर की धोती, कमीज़ और ठंडी सदरी पहने (उनके पास गरम कपड़े थे ही नहीं) सुखदेवराज के साथ संजीदगी से बातें कर रहे थे। अचानक नॉटबावर वहाँ पहुँचा और कार से उतरते-उतरते आज़ाद को देखते ही गोली दाग दी। गोली निशाने पर लगी और उनकी दाहिनी जाँघ को चीरती हुई हड्डी तोड़कर निकल गयी। (.455 बोर की गोली थी, जिससे अच्छे-अच्छे जानवर भी क्षण-भर में बिलट जाते हैं। आदमी की तो बिसात ही क्या !)
आज़ाद को पूरी स्थिति भाँपते देर न लगी। उन्होंने सुखदेवराज को शीघ्र की वहाँ से खिसक जाने का संकेत किया। (शायद, स्वयं भी घेरे से निकल भागने में कामयाब हो जाते, यदि नॉटबावर की पहली गोली से उनकी जाँघ की हड्डी
कुछ अधखुले पन्ने

”सहित 15 मिनट के अन्दर एलफ्रेड पार्क घेर लेने का आदेश मिला। गोली चलने
की पूरी-पूरी आशंका भी व्यक्त की गयी।
तुरन्त

पूरी तैयारी तो थी ही । मैज़र्स को फोन खटखटाया गया आर्ल्ड फोर्स के लिए।
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